इस कविता को महेश संतोषी ने बहुत समय पहले लिखा था। यद्यपि यह बहुत ही त्रासद है और मेरे फलसफे से मेल नहीं खाती ,फिर भी यह मुझे बहुत पसंद है,जाने क्यों।
एक भूल काफी है
याद भूल जाने को एक उम्र कम है पर,
एक भूल काफी है उम्र भर रुलाने को !
एक सांस जीवन में एक बार आती है,
बार बार लेकिन क्यों आँख डबडबाती है ?
मनचाहा आँचल तो मुश्किल से मिलता है,
इसी लिए आंसू को धूल बहुत भाती है !
रूप के बढ़ाने को लाख फूल काम हैं पर,
चार फूल काफी हैं अर्थियां सजाने को।
कुछ तो मन मृगजल के पीछे भरमाता है,
कुछ मन का मेघों से मरुथल सा नाता है।
आशा ही आशा में होंठ सूखे जाते हैं पर
कौन बुझे प्राणों की प्यास बुझा पाता है।
याद भूल जाने को एक उम्र कम है पर,
एक भूल काफी है उम्र भर रुलाने को !
एक सांस जीवन में एक बार आती है,
बार बार लेकिन क्यों आँख डबडबाती है ?
मनचाहा आँचल तो मुश्किल से मिलता है,
इसी लिए आंसू को धूल बहुत भाती है !
रूप के बढ़ाने को लाख फूल काम हैं पर,
चार फूल काफी हैं अर्थियां सजाने को।
कुछ तो मन मृगजल के पीछे भरमाता है,
कुछ मन का मेघों से मरुथल सा नाता है।
आशा ही आशा में होंठ सूखे जाते हैं पर
कौन बुझे प्राणों की प्यास बुझा पाता है।
प्राण दान पाने को एक बूँद मुश्किल पर,
एक बूँद काफी है जिंदगी डुबाने को।
प्रात कब हंसाता है,सांझ कब सुलाती है,
किस किस से साँसों की कथा लिखी जाती है।
समय सभी घावों को पूर नहीं पाता है ,
एक बूँद काफी है जिंदगी डुबाने को।
प्रात कब हंसाता है,सांझ कब सुलाती है,
किस किस से साँसों की कथा लिखी जाती है।
समय सभी घावों को पूर नहीं पाता है ,
दबी हुई पीड़ा भी उभर उभर आती है।
दर्द के मिटाने को सौ सौ सुख काम हैं पर,
एक दर्द काफी है लाख सुख भुलाने को।
एक दर्द काफी है लाख सुख भुलाने को।